बेरोजगारी का हाल बुरा

अगर आप 1950, 60, 70, 80 के दशक को देखें तो लोकतांत्रिक माहौल में उत्पादन पर जोर होता था। ब्रिटेन, भारत, अमेरिका जैसे देश वस्तुओं का उत्पादन करते थे। लेकिन बाद में जो भी वजह रही हो, यह सब काम चीन को ‘पार्सल’ कर दिया गया और आज हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जिसमें जोर-जबरदस्ती के माहौल वाला उत्पादन मॉडल है। लोकतांत्रिक माहौल में कोई उत्पादन मॉडल नहीं है। लोकतांत्रिक देशों में अब उत्पादन (वस्तुओं और सेवाओं का) प्रभावी ढंग से नहीं किया जा रहा है। मैं उत्पादन के चीनी मॉडल को सही नहीं मानता क्योंकि यह जोर-जबरदस्ती वाला मॉडल है। लेकिन चीनी इसमें माहिर हैं। हां, लोकतांत्रिक देशों में धन के भारी जमाव और बढ़ती असमानता की दिक्कत जरूर है।

अपनी पदयात्रा के दौरान जब मैं बेल्लारी नाम के एक कस्बे से गुजरा तो वहां के लोगों ने कहा कि यह जींस बनाने का केंद्र रहा है और मुझे देखना चाहिए कि आज क्या हालात हैं। फिर मैंने आधा दिन बेल्लारी घूमने और जींस उत्पादन का हाल जानने में बिताया। कभी इसमें पांच लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ था और आज इनमें काम करने वाले लोगों की संख्या 40,000 रह गई है। बड़ी तादाद में हुनरमंद लोग खाली बैठे हैं। ऐसे केंद्र देश भर में हैं- बेल्लारी, मुरादाबाद… हर जगह।

भारत के लगभग हर जिले में एक कौशल आधार है जो गहरा है। लेकिन आज क्या हो रहा है? जगह-जगह पैसों का विशाल जमाव है। पूरी बैंकिंग व्यवस्था तीन-चार उद्योगपतियों के हाथ में है। बेचारा हुनरमंद वहीं पड़ा बर्बाद हो रहा है। बेल्लारी में लाखों लोग बेरोजगार हैं। अगर उनके लिए बैंकिंग सिस्टम सुलभ हो जाए, अगर उसे टेक्नोलॉजी से जोड़ दें तो यही बेल्लारी लाखों रोजगार पैदा कर देगा।

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि बड़े कारोबार के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए लेकिन आज जिस तरह का एकाधिकार हो रहा है, वह जरूर गंभीर समस्या है। मैं नहीं मानता कि भारत जैसा देश अपने सभी लोगों को सेवाओं में काम दे सकता है। इसलिए, मेरे मन में एक सवाल उठता है – क्या हम लोकतांत्रिक उत्पादन मॉडल खड़ा कर सकते हैं?



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