अजित पवार ने भी फडणवीस को संवैधानिक प्रोटोकॉल का पाठ पढ़ाया: ‘मैं, अपनी पार्टी के नेता के रूप में, यह तय नहीं कर सकता कि मेरे विधायक कहां बैठें। यह स्पीकर का विशेषाधिकार है।’ लेकिन फिर यह शिवसेना (यूबीटी) ही थी जिसने वास्तव में फडणवीस और भाजपा के लिए विकट स्थिति पैदा की, यह बताते हुए कि विद्रोही एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल पर भी मनी लॉन्ड्रिंग और दाऊद के सहयोगियों से रिश्तों के ऐसे ही अप्रमाणित आरोप हैं। फिर भी ऐसा लगता है कि उन्हें पटेल की भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ मेलजोल से कोई दिक्कत नहीं है। यानी मलिक के पास पार्टी लाइन से ऊपर उठकर मित्र हैं। फडणवीस को इस गुगली को झेलने में मुश्किल हो सकती है।  

वाइन है सभी के लिए  

एक समय था जब शरद पवार ने यह घोषणा करके महाराष्ट्र में एक बड़ा विवाद पैदा कर दिया था कि वाइन को सुपरमार्केट से बेचा जाना चाहिए और इसे शराब की दुकानों तक ही सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। वह वास्तव में वाइन उद्योग का लोकतंत्रीकरण और इसके साथ ही देश के ‘अंगूर कैपिटल’ नासिक के किसानों के हितों को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे थे। नासिक के अंगूर किसानों ने लंदन, पेरिस और अन्य यूरोपीय और लैटिन अमेरिकी राजधानियों में हुए तमाम अंगूर शो में धूम मचाई थी। तब से, भारतीय वाइन भी लंदन, पेरिस, सिडनी और न्यूयॉर्क के रेस्तरां में पहुंच गई है। फिर भी भारत में वाइन केवल अभिजात वर्ग की पेय बनी हुई है जिसके कारण शराब बाजार में इसकी हिस्सेदारी बहुत कम है।  

जहां नासिक में 25 साल पुराना सुला वाइनयार्ड हर साल नियमित रूप से वाइन चखाने का आयोजन करता है, वहीं अब भारतीय वाइन को सबसे अप्रत्याशित स्थानों में एक नया घरेलू आधार मिल गया है- नागपुर जो अपने संतरे और कपास के लिए बेहतर जाना जाता है।  



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