एक तरफ तो अध्यक्ष और गृह मंत्री ने संसद की सुरक्षा में दरार को मामूली, क्षति न पहुंचाने वाली घटना बताकर खारिज किया जिसका उनके अनुसार, राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए और उसे जरूरत से ज्यादा नहीं उछाला जाना चाहिए; दूसरी ओर, सरकार ने छह आरोपी युवकों को आतंकी आरोपों में गिरफ्तार किया और उन पर यूएपीए के तहत कार्रवाई कर रही है। अगर यह घटना सचमुच षड्यंत्र का हिस्सा थी जैसा कि सत्तारूढ़ गठबंधन ने जोर देकर कहा है, तब तो यह संसद में बहस के लिए ज्यादा मजबूत मुद्दा है।

146 सांसदों और वे भी सभी विपक्ष से, के संसद के दोनों सदनों से निलंबन में यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि इनमें एक ऐसे भी सदस्य हैं जो जब निलंबन हुआ, संसद में नहीं, सुदूर तमिलनाडु में थे। न, इसने संसद या आसन की प्रतिष्ठा को आघात नहीं पहुंचाया और इस मसले को ध्यान दिलाने के बाद हंगामा मचने पर संबंधित सदस्य का निलंबन वापस ले लिया गया। अगर अन्यत्र ‘व्यस्त’ प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने आधा घंटे का वक्त निकाल लिया होता और अपने कार्यालयों द्वारा तैयार बयान ही पढ़ दिए होते, तो  विपक्षी सांसदों को खड़े होने, वेल में जाने या तख्तियां-पोस्टर लहराने की जरूरत ही नहीं होती।



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