हाल के दिनों तक नागपुर कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है। इसी नागपुर ने 1980 में इंदिरा गांधी को सभी 11 लोकसभा सीटें देकर उनकी वापसी का मार्ग प्रशस्त किया था। जब पी वी नरसिम्हा राव 1984 की कांग्रेस लहर में भी अपनी सीट हार गए थे, तो राजीव गांधी ने उन्हें नागपुर के मंदिर नगर रामटेक से चुनाव लड़ाया था और इस तरह एक भावी प्रधानमंत्री की साख बची थी।

2004 के लोकसभा चुनाव से पहले जब सोनिया गांधी ने नागपुर के सबसे बड़े मैदान कस्तूरचंद पार्क में रैली की थी, तो लोगों की भीड़ आसपास के तमाम रास्तों तक जमी हुई थी। इतनी विशाल भीड़ थी कि ट्रैफिक जाम हो गया था और उसी मैदान पर होने वाली बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी की रैली रद्द कर दी गई थी क्योंकि बीजेपी को डर था कि उसकी रैली में इतनी भारी संख्या में लोग नहीं आएंगे और इससे बीजेपी-आरएसएस की लोकप्रिय छवि को आघात लगेगा। और अब, राहुल गांधी भी आरएसएस मुख्यालय में ही मोहन भागवत को उसी तरह चुनौती दे रहे हैं जिस तरह महात्मा गांधी ने तब हेडगेवार को दी थी।

तो क्या कांग्रेस अपना पूर्व गढ़ और देश बीजेपी से छीनने को तैयार है? लगता तो कुछ ऐसा ही है।



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