पिछले महीने जब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हो रही थी तो अटॉर्नी जरनल और सॉलिसिटर जनरल को कोर्ट के सामने यह बताने में पसीने छूट गए कि इलेक्टोरल बॉन्ड की व्यवस्था एकदम पारदर्शी है और ऐसी कोई गुंजाइश नहीं है कि शेल कंपनियां किसी भी तरह राजनीतिक दलों को कालेधन से चुनावी चंदा दे सकें। उम्मीद करें कि आने वाले वक्त में वह कोर्ट को यह भी बताएंगे कि किस तरह आयकर कानून (इनकम टैक्स ऐक्ट) और कंपनीज एक्ट में बदलाव कर यह व्यवस्था कर दी गई है कि किसी भ कंपनी को राजनीतिक चंदे का जिक्र अपने खातों में करने की जरूरत नहीं है।

लेकिन देश के नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि आखिर इन एक्ट में बदलाव क्यों किए गए, जिससे राजनीतिक दलों को विदेशी चंदा लेने की छूट मिल गई और क्यों कि पहले तीन साल में जो व्यवस्था लागू थी कि कोई भी कंपनी अपने मुनाफे के 7.5 फीसदी से अधिक चुनावी चंदा नहीं दे सकती, उसे क्यों खत्म कर दिया गया।

और, इससे भी बड़ा सवाल कि अगर सरकार पारदर्शिता में इतना ही विश्वास करती है तो उसे इलेक्टोरल बॉन्ड की जरूरत क्यों है? चंदा देने वाले तो चेक के जरिए या फिर डिजिटल ट्रांसफर के जरिए भी राजनीतिक पार्टियों को चंदा दे सकते हैं और पार्टियां चुनाव आयोग के सामने उनकी घोषणा भी कर सकती हैं।



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