हिंदी फिल्म जगत में हॉरर और कॉमिडी फिल्मों का हमेशा से एक विशेष दर्शक वर्ग रहा है, जो इस तरह की फिल्मों को चलाता रहा है। इस जॉनर में फिल्मकार विक्रम भट्ट की पकड़ काफी मजबूत रही है। ‘गुलाम’ के बाद ‘राज’ जैसी सुपरहिट हॉरर फिल्म देने वाले विक्रम भट्ट ने ‘राज: द मिस्ट्री कंटीन्यू’, ‘राज 3डी’, ‘राज रीबूट’, ‘1920’, ‘शापित’, ‘हॉन्टेड 3डी’, ‘घोस्ट’, ‘क्रीचर 3डी’ जैसी फिल्में देकर हॉरर के सिलसिले को बनाए रखा। अब जब उनकी बेटी कृष्णा भट्ट ने निर्देशन की राह चुनी, तो अपने पिता की तरह हॉरर की उसी परंपरा का निर्वाह किया है। यह कहना गलत न होगा कि कृष्‍णा की डेब्‍यू फिल्म में पिता की छाप साफ नजर आती है।

‘1920: हॉरर्स ऑफ द हार्ट’ की कहानी

कहानी की शुरुआत होती है मेघना (अविका गौर) और अर्जुन (दानिश पंडोर) के प्रेम प्रसंग से। मेघना की 21वीं सालगिरह है और वो इस बर्थडे पर गिफ्ट के रूप में अपने पिता धीरज से अपने बॉयफ्रेंड अर्जुन को मांगने का मन बना चुकी है। मगर तभी उसकी जिंदगी में तूफान आ जाता है। उसे पता चलता है कि उसके पिता ने फांसी लगाकर खुदकशी कर ली है। पिता की आत्महत्या का कारण जानकर वह सदमे में आ जाती है। उसे पता चलता है कि सालों पहले ऐशो-आराम के लिए उसकी मां राधिका (बरखा बिष्ट) उसे और उसके पिता को छोड़कर चली गई थी। पिता की मौत की जिम्मेदार भी वही है।

बदले की आग में जलने वाली मेघना अपने पिता की रूह का इस्तेमाल करके अपनी मां राधिका और उसके पति शांतनु (राहुल देव) और बेटी अदिति की खुशहाल जिंदगी को बर्बाद करने का षड्यंत्र रचती है। मेघना इस बात से बिलकुल अनजान है कि वह अपनी जिस मां के घर को बर्बाद करने जा रही है, उसकी सच्‍चाई कुछ और है। मेघना बदला लेने की इस राह पर किस हद तक जाती है? क्या उसे अपनी मां की सच्चाई का पता चल पाता है? इन सवालों का जवाब आपको फिल्म देखने पर मिलेगा।

‘1920: हॉरर्स ऑफ द हार्ट’ का ट्रेलर

‘1920: हॉरर्स ऑफ द हार्ट’ का रिव्‍यू

किसी मासूम पर भूत का साया और फिर उस भूत को भगाने के लिए धार्मिक कर्मकांड हॉरर फिल्मों का सदाबहार फॉर्मूला है। यहां निर्देशक के रूप में कृष्णा हॉरर का दूसरा रास्ता चुनती हैं और वो है बदले की भावना। यही इस फ्रेंचाइजी को अलग बनाती है, मगर फिर भूत की शिकार तो मासूम अदिति ही है। सेट डिजाइनिंग हो या विजुअल इफेक्ट्स कृष्णा की फिल्म विक्रम की फिल्म का एक्सटेंशन ही नजर आती है। फर्स्ट हाफ में फिल्म हॉरर दिखाने के लिए संघर्ष करती है, मगर इंटरवल के बाद यह अपनी हॉरर शैली पर कायम रहती है।

फिल्म की सबसे बड़ी दिक्कत है, इसकी 1920 के दशक के बैकड्रॉप पर बुनी हुई कहानी। हालांकि ये हॉरर के इंपैक्ट को बनाए रखने के लिए रची गई होगी। सुनसान जंगल में घने कोहरे के बीच मोमबत्तियों की रोशनी के बीच आलिशान महल, धुंआ उगल कर सरपट भागती ट्रेन, फॉग वाला डरवाना रेलवे स्टेशन जैसे हॉरर के फॉर्मूले हम सालों से देखते आए हैं। हॉरर पैदा करने के लिए रचे गए दृश्यों में तर्क का अभाव नजर आता है। संगीत की बात करें, तो महेश भट्ट और विक्रम भट्ट की फिल्मों का संगीत हमेशा से फिल्म का प्लस पॉइंट रहा है, मगर यहां लोरी वाले एक गाने को छोड़ कर पुनीत दीक्षित के संगीत में कोई भी गाना प्रभाव नहीं जमा पाता। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर दमदार है।

अभिनय के मामले में मेघना के रूप में मेन लीड अविका गौर ने अपने किरदार को मजबूत बनाने की हरचंद कोशिश की है, मगर छोटे पर्दे की यह अभिनेत्री पर अपने धारावाहिक ‘बालिका वधू’ की छाया से निकलने में नाकाम रही हैं। अविका के बॉयफ्रेंड के रूप में दानिश पंडोर निराश करते हैं। बरखा बिष्ट और राहुल देव ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। मेघना की सौतेली बहन अदिति के रूप में केतकी कुलकर्णी का अभिनय याद रह जाता है।

क्यों देखें – हॉरर फिल्मों के शौकीन यह फिल्म देख सकते हैं।



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